संसद भवन तक पहुंचने की डगर, पनघट की कमजोर पार्टी में गुटबाजी के चलते राह आसान नहीं 

इस बार के 2019 का चुनाव मैं इस बार प्रचार प्रसार बिलकुल दिखाई नहीं दे रहा है या फिर यह माना जाए कि चुनाव आयोग सख्त है। शहर की गलियां तो सूनी पड़ी हैं।साथ साथ प्रत्याशियों के कार्यालय पर अगर नजर डाली जाए तो वहां पर भी मायूसी नजर आ रही है। मतदान में अब चंद दिन ही बचे हैं हर प्रत्याशी अपनी जीत  को लेकर लंबे लंबे दावे कर रहे हैं। चाहे वो किसी भी पार्टी के नेता हो और विकास का आइना दिखा रहे हैं लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा कि ताज किसके सिर सजेगा शहर लोकसभा में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला दिखाई दे रहा है। वाराणसी की सीट शुरू से ही बीजेपी के खाते में रही है और इस बार चुनाव और रोचक हो चुका है। क्योंकि कुर्मी वोट बैंक काफी बड़ी तादाद में है और हर कोई प्रत्याशी अपने अपने तरीके से  वोटरों को लुभा रहा है।

बीजेपी के सांसदो के सामने उनके ही रिश्तेदार खड़े हैं जो कि गठबंधन के प्रत्याशी भी हैं। और क्षेत्र में अपनी अलग छवि रखते हैं और अगर बात करे कांग्रेस के प्रत्याशी की तो उनके साथ पार्टी के कुछ नेताओं ने किनारा कर लिया है इससे साफ है कि कहीं ना कहीं पार्टी का एक गुट प्रत्याशी के खिलाफ है यही वजह है कि इस बार नगर पनघट की कमजोर है लंबा क्षेत्र होने की वजह से शहर के अधिकांश इलाकों में पहुंच पाना उनके लिए नाकाफी रहा है। कार्यालयों पर देर रात रियलिटी चेक किया गया तो हकीकत सामने आ गई। बीजेपी से लेकर गठबंधन के प्रत्याशियों के यहां भीड़ का जमावड़ा लगा था लेकिन कांग्रेस का कार्यालय सुना दिखाई दे रहा था ऐसे में सवाल है कि इन नेताओं की डगर काफी कमजोर है।

लोकसभा सीट का समीकरण

शहर लोकसभा सीट पर वैश्य दलित और मुस्लिम वोटरों का शुरू से ही वर्चस्व रहा है 2014 लोकसभा चुनाव में भी 16 लाख से अधिक वोटरों ने अपने मत का प्रयोग किया था।अगर इस सीट पर पुरुष और महिलाओं के मतदाता की बात करें तो इसमें पुरुष लगभग 9 लाख के आस पास है और महिलाएं 7 . 5% महिला मतदाता है। इस सीट पर मुसलमान भी अपने मत का प्रयोग कर खेल बना भी सकता है। और बिगाड़ भी सकता है। क्योंकि मुसलमानों के वोट बैंक पर सभी प्रत्याशियों की निगाह टिकी हुई है…….

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