अष्टमी और नवमी का व्रत दोनों 13 अप्रैल को —

अष्टमी और नवमी का व्रत दोनों 13 अप्रैल को

कन्या पूजन प्रातः 8.16 के बाद

वासन्तिक नवरात्र के अंतिम दिन 13 अप्रैल ’19 को अष्टमी एवं नवमी तिथि दोनों है । ऐसी स्थिति में नवरात्र के प्रथम दिवस (प्रतिपदा तिथि) और अंतिम में अष्टमी तिथि का व्रत रखने वाले अष्टमी का व्रत 13 अप्रैल को ही रहेंगे ।

शास्त्रों में उल्लिखित है कि अष्टमी तिथि यदि नवमी के साथ संयुक्त हो तो वह तिथि उत्तम है । इसके पक्ष में शास्त्रकारों ने लिखा है कि ‘चैत्रशुक्ल अष्टम्यां भवन्या उत्पत्ति:, तत्र नवमी युता ग्राह्या:।’

इसी के साथ नवमी तिथि का भी व्रत उपवास एवं पूजन 13 अप्रैल को ही किया जाएगा । इस दिन प्रातः 8.16 तक अष्टमी है, इसके बाद नवमी लग जाएगी । जिसमें मध्याह्न श्रीरामजी का जमोत्सव का पर्व मनाने का विधान है ।

नवरात्र में दुर्गास्वरूपा कन्याओं का पूजन नवमी तिथि प्रातः 8.16बजे के बाद होगा। कन्या पूजन नवमी तिथि में अपनी श्रद्धा एवं स्थिति को देखते हुए समय निर्धारित करना चाहिए । चूंकि रविवार, 14 अप्रैल को प्रातः 6 बजे तक ही नवमी है, ऐसी स्थिति में कन्यापूजन पूर्व शाम तक कर लेना चाहिए तथा रविवार को नवमी समाप्त होते पूरे नवरात्र तक व्रत रहने वाले व्रत-समाप्त (पारण) करें ।

इस वर्ष अष्टमी एवं नवमी का एक साथ व्रत उपासकों के लिए लाभप्रद है क्योंकि शास्त्रों में रामनवमी व्रत की अनिवार्यता बताई गई है । नवमी में व्रत न रहने के दोष बताए गए हैं । इसलिए वासन्तिक नवरात्र में कम से कम प्रथम दिवस के साथ अष्टमी एवं नवमी तिथि का व्रत रखकर त्रिदिवसीय व्रत के माध्यम से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त होने का सामर्थ्य अर्जित करना चाहिए । जबकि शारदीय नवरात्र में प्रथम और अष्टमी के व्रत के साथ मध्य में किसी एक तिथि में और व्रत रहना चाहिए । शारदीय नवरात्र में नवमी के अंतिम चरण में पारण करना चाहिए ।

वासन्तिक नवरात्र की अष्टमी तिथि को अशोक वृक्ष की आठ कली को पीसकर पीने से रोग-शोक से मुक्ति का विधान शास्त्रकारों ने किया है ।

कन्यापूजन के लिए कन्याओं की संख्या अपने सामर्थ्य के अनुसार करें । शास्त्रकारों ने सामाजिक सद्भाव को ध्यान में रखते हुए हर वर्ण की कन्याओं के पूजन का विधान किया है । जिसमें ब्राह्मण कन्या के पूजन से सभी कार्यों की प्राप्ति बताया है जबकि जय, विजय के लिए, आर्थिक लाभ के लिए वैश्य तथा वंशवृद्धि (पुत्र की कामना) के लिए दलित कन्या के भी पूजन का विधान किया है । पूजन में कृपणता न करने का भी निर्देश दिया गया है ।

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