बुन्देलखण्ड का एक गाँव जहा आजादी के बाद से कोई स्कूल नही गया

आपको यकीन नही होगा कि आज भी एक गांव ऐसा है चित्रकूट में जहां आजादी के बाद से अब तक किसी भी पीढ़ी ने परोक्ष रूप से स्कूल का मुंह तक नही देखा । जी हां अंत्योदय की बात करने वाली सरकारें भी इस गांव की बदहाली आज तक सुधार नही पाईं । गढ़चपा ग्राम पंचायत के बड़ाहार मजरे की मौजूदा हालत बदतर हैं । फिलहाल बीते 70 वर्ष के बाद अब बिजली आ गई है ।

मौजूदा प्रधान जी के परिश्रम ने यहां ज्यादा से ज्यादा आवास पहुंचाने में मदद की , गांव में मनरेगा के तहत कुछ दूर तक आवागमन हेतु मिट्टी भी डलवा दी । लेकिन वन विभाग की अड़चन और जनप्रतिनिधियों की असंवेदनशीलता के चलते इस गांव का मुख्य सड़क से आज तक कोई सीधा संपर्क नहीं है । इस गांव में कोल आदिवासी रहते हैं जिनके सामने दस्यु समस्या भी किसी मुसीबत से कम नही ।

गांव में न तो स्कूल है और न ही पर्याप्त मात्रा में पेयजल की व्यवस्था । इस गांव में निवास करने वाली आबादी में आधे से ज्यादा पुरुष रोजगार की तलाश में परदेश पलायन कर चुके हैं । चारो तरफ घने जंगल मे घिरे इस गांव में पेयजल सबसे बड़ा संकट है । फिलहाल चुनाव हैं और गांव वालों का भी कहना है कि मतदान करने का ज्यादा मन तो नही है । क्योंकि हमें इतने वर्षों से मतदान करने के बावजूद जरूरी सुविधाएं नहीं मिली । बावजूद इसके इस गांव के आदिवासियों ने हमेशा ही मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया है । इस बार भी गांव वालों ने कहा है कि हम मतदान जरूर करेंगें । एक दिन हमे सम्पूर्ण विकास मिलेगा ऐसी हमारी आशा है ।

इस गांव में सरकारी सिस्टम कैसे फेल नजर आता है इसकी बानगी भर ये है कि गाँव मे लेखपाल भी कभी नही आता । बाकी प्रधान जी महीने में तीन-चार बार आ ही जाते हैं। चुनावी बयार के बीच सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि आखिर इस लोकतंत्र में मतदाता कब तक सियासी हुक्मरानों की बेड़ियों में जकड़े रहेंगें और उनके झूठे आश्वासन पर अगले 5 वर्ष शांति से बिता देंगे !

गरीबी हटाओ और अंत्योदय की बात करने वाली सरकारों के दावें चित्रकूट जिले के इस आखिरी गांव में दम तोड़ते नजर आते हैं । जिला प्रशासन का सबसे छोटा कर्मचारी लेखपाल तक कभी इस गांव नही जाते । जनप्रतिनिधियों की गाड़ियां ज्यादा बड़ी हैं शायद इसलिए इस गांव में घुसने की वो हिमाकत नही करते ।

शर्म आनी चाहिए इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से सहयोग देने वालों ने आजादी के बाद से आज तक इस गांव की मौजूदा चौथी पीढ़ी तक को स्कूल नहीं भेज पाये । सनी जैसे सैकड़ो कोलादिवासी बच्चे पढ़ना चाहते हैं लेकिन शायद इन्हें अपने पूर्वजों की तरह ऐसे ही अशिक्षित रहकर जीवन बिताना पड़ेगा ।

कोल आदिवासी समाज को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का बीड़ा उठाये तथा कथित ठेकेदार और संस्थाओं से लेकर फोटॉस और छपास रोग से पीड़ित नेताओं को शर्म आनी चाहिए जिनके रहते भी इस गांव में शिक्षा ,स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सूविधाओ की समुचित व्यवस्था नही हो सकी । वैसे प्रशासन की भी कम गलती नही है क्योंकि हर कार्य को धरातल पर उतारने का कार्य उन्ही का है । गढ़चपा ग्राम पंचायत के प्रधान धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इन आदिवासी गांवों में कुछ ठोस और सार्थक पहल की है जो देखने लायक है ।

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