मीडिया का पतन लोकतंत्र पर आघात?

*1975 में घोषित किया गया आपातकाल भारतीय मीडिया के इतिहास में काले दिनों के रूप में दर्ज है! परंतु वह एक घोषित एवं अधिकारिक रूप से लगाया गया आपातकाल था जिसमें केवल मीडिया ही नहीं बलिक देश केसभी तंत्रों पर शिकंजा कसने की कोशिश गई थी!

जाहिर है मीडिया भी उन्ही में एक थाl हालांकि आपातकाल किन परिस्थितियों में लगाया गया यह एक अलग बहस का विषय है परंतु निश्चित रूप से मीडिया की आजादी का गला घोटना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है जो 1975 में इंदिरा गांधी के शासन काल में किया गया! और 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद इंदिरा गांधी को लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोटने के इस प्रयास का खामियाजा भी भुगतना पड़ाl

देश का लगभग समूचा विपक्ष तथा सारी मीडिया घराने एकजुट होकर गांधी की उस सत्ता को उखाड़ फेंकने में सफल रहे जिसके बारे में यह माना जाता था कि इंदिरा गांधी की सत्ता अजेय सत्ता हैl परंतु आज देश में न तो आपातकाल की स्थिति है न ही देश में 1975 के पहले का वह वातावरण है जिसमें चारों ओर रेल हड़ताल औद्योगिक क्षेत्रों की तालाबंदी या बड़े पैमाने पर अराजकता फैलाने जैसा वातावरण दिखाई दे रहा होl वर्तमान सत्ता के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण केवल यह है कि वह किस प्रकार 2019 में भी अपनी सत्ता को कायम रख सकेl

और दूसरा प्रयास यह कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के सभी राज्यों में इनकी सत्ता सुनिश्चित हो? इसके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से वर्तमान केंद्रीय सत्ता एक ऐसे संगठन से संरक्षण प्राप्त है जिसका उद्देश्य देश को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करना हैl अपने इसी दूरगामी लक्ष्य को हासिल करने के लिए सत्ता की ओर से लगभग प्रत्येक वह कदम उठाए जा रहे हैं जो लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट के कारण बन सकते हैं देश में सरकारी धन से संचालित होने वाले दूरदर्शन लोकसभा और राज्यसभा टीवी आकाशवाणी आदि जनता के पैसे से चलाए जाने वाले सरकारी मीडिया नेटवर्क हैl

पत्रकारिता अथवा मीडिया के सिद्धांतों के अनुसार इन्हें भी निष्पक्ष पत्रकारिता का ही प्रदर्शन करना चाहिए परंतु आमतौर पर इन्हें सरकारी भोंपू ही कहा जाता हैl इसी दूरदर्शन को राजीव गांधी के शासन में विपक्ष राजीव दर्शन के नाम से पुकारा करता थाl परंतु आज न केवल इन सरकारी माध्यमों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो चुके हैं बल्कि देश की मुख्यधारा की अनेक TV चैनल एवं मीडिया समूह इस पूरी तरह पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता करने में जुटे हुए हैंl कल अगर एक सरकारी चैनल को राजीव दर्शन कहा जाता था तो आज अधिकांश TV चैनल मोदी दर्शन बनकर रह गए हैंl

बिना आपातकाल की ही अधिकांश टीवी एंकर मोदी का ऐसा कसीदा पढ़ रहे हैं तथा सामाजिक विभाजनकारी एजेंडे पर इस तरह काम कर रहे हैं गोया ऐसे मीडिया संचालकों में जमीर नाम की कोई चीज ही न बच्ची हो? जिस मीडिया को देश में अमन व शांति सांप्रदायिक सौहार्द की बात ही करनी चाहिए उसी मीडिया द्वारा सांप्रदायिकता सौहार्द की बातें करनी चाहिए उसी मीडिया द्वारा सांप्रदायिकता फैलाने वाली तथा दो समुदाय के बीच रेखाएं खींचने वाली बातें चीख-चीखकर की जा रही हैl हद तो यह है कि पिछले 4 सालों के बीच कई बार TV स्टूडियो में हाथापाई धक्का-मुक्की व गाली गलौज जैसे दृश्य भी देखे जा चुके हैंl कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें किसी मीडिया समूह के मालिक ने किसी ऐसे एंकर की छुट्टी कर दी जिसने किसी सरकारी मेहमान के साक्षात्कार के समय कुछ ऐसे चुभते सवाल कर लिए जिसका जवाब देना उसके लिए असहज था?

मोहित मिश्रा

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