काशी नगरी और नगर वासी

कहा जाता है कि काशी शिव की नगरी भोले के त्रिसूल पर बसी है,
बनारस एक ऐसा शहर जहाँ न कभी रात का अहसास होता है न कभी अकेलेपन का।
ये एक ऐसा शहर है जो बाबा के अनुसार हमेशा शांत किंतु बहुत तेजी से चलता है।
यहाँ शाम की अढ़ी है तो घाट पर मढ़ी भी है।
यहाँ मर्यादा की मांग है तो सुबह से घुलती भांग है। यहाँ घाट किनारे राज शाही शान है तो तो हर में मुँह में मिलता पान भी है। यहाँ मस्ती सरोवर है,तो भौकाल परम्परावार है, लोग यहाँ के अपनी अल्हड़ता पान की पिक की पिचकारी दिवालो को लाल करती, सर्द हवाओं में ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान करना, काशी की नगरी को और मनोरम छटा की अलख जगाती है।
सुबहे बनारस की मीठी मुस्कान कानो में सुरसुराती हवाओ का हल्का हल्का सहलाना और दोनों हाथ फैला के भगवान भाष्कर का आंख बंद कर अभिवादन करना अपने आप मे भोले भंडारी की नगरी को और चारचांद लगा देते है,
शाम को गंगा आरती और उसके बाद गोलगप्पे चाट आखिर में भांग और ठंडाई का रसपान करने के बाद फिर जो राजनीति की बाते,सुख दुख चर्चा, और खुद को अपने आप मे भौकाल मारते दिखाई देंगे,
यही मस्ती बनारस की शान है!
कुछ समय जो घाट के किनारे बीत जाए वही यहाँ की सुकून भरा समय होता है,
यहाँ के ट्रैफिक में गाड़ी चलाना एक करामात है,
यहाँ तो डोम राजा का भी एक अभिमान है,
यहाँ सोता नही कोई खाली पेट है,
क्योंकि यहाँ माँ अन्नपूर्णा की परोसी हुई प्लेट है,
किसी को नही होता यहाँ अभिमान है क्योंकि काशी जन्म लेना ही एक वरदान है,
।।हर हर महादेव।। अतुल कुल,वाराणसी

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